
माँ हनुमंताधामदर्शन
श्रद्धा और भक्ति का पावन केंद्र। माँ हनुमंता धाम में पधारें और दिव्य ऊर्जा का अनुभव करें।
भक्ति कापावनसंकल्प
माँ हनुमंता धाम में, हम सेवा को केवल एक कार्य नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति समर्पण का एक शांत माध्यम मानते हैं। प्रत्येक श्रद्धालु यहाँ एक पवित्र उद्देश्य के साथ आता है — अपनी आस्था को मूर्त रूप देने। हमारा दायित्व है कि हम इस श्रद्धा को पूरी गरिमा के साथ स्वीकार करें और उसे मंदिर की परंपराओं के अनुरूप ढालें। हम मानते हैं किमंदिर का हर कण भक्ति का प्रतीक है — एक ऐसी रचना जो तकनीकी रूप से सुदृढ़ और आध्यात्मिक रूप से पूर्ण होनी चाहिए। निर्माण की कला, प्राण प्रतिष्ठा की विधि, और सेवा का अनुशासन: ये हमारे धाम की आधारशिला हैं। हमारा विश्वास है किजब सेवा भाव से की जाती है, तो वह स्वयं ईश्वर का आशीर्वाद बन जाती है — एक अदृश्य कवच, जो भक्त को सदैव अपनी कृपा की छाया में सुरक्षित रखता है।
अटूट श्रद्धा
प्रत्येक अनुष्ठान और सेवा में हमारी पूर्ण निष्ठा है, जो मंदिर की पवित्रता और मर्यादा को अक्षुण्ण रखती है।
दिव्य सेवा
हमारा संकल्प केवल निर्माण नहीं, बल्कि भक्तों के हृदय में भक्ति का संचार करना और सेवा भाव को जागृत करना है।
इतिहास गाथा
माँ हनुमंता धाम का इतिहास
माँ हनुमंता धाम की स्थापना से लेकर आज तक की गौरवमयी यात्रा, जो श्रद्धा और भक्ति के अटूट विश्वास का प्रतीक है।
संकल्प
माँ हनुमंता धाम की नींव एक दिव्य संकल्प से रखी गई। गुरु जी के मार्गदर्शन में, भक्तों ने एक ऐसे पावन स्थल की कल्पना की जहाँ भक्ति और शांति का संगम हो। माँ प्रेरणा शक्ति द्वारा कथन, मातृ देवों भवः संसार में सभी प्राणियों के लिए मातृ भाव की महती महिमा है। मानव अपनी सबसे अधिक श्रद्धा स्वाभाविक रूप से माता-पिता के चरणों में अर्पित करता है क्योंकि जन्म से सर्वप्रथम माता अपनी गोद में लोक दर्शन कराती है, इसलिए मातृशक्ति ही आदि गुरू के रूप में प्रतिष्ठित है। माँ की करूणा और कृपा बालकों के लौकिक तथा परलौकिक कल्याण का आधार है इसलिए ''मातृदेवोभवः''। शक्ति से रहित होना ही शून्यता है। शक्तिहीन पुरुष का कहीं भी आदर नहीं होता है। माँ की सेवा ही भक्ति है, और शक्ति का आधार है। प्रश्न बनता है कि “माँ हनुमंता” नाम कैसे पड़ा? दुर्गा सप्तशती में दुर्गा के 108 नाम है। जिसमें एक नाम है “अहंता”। अहंकार को नष्ट करने वाली माँ “अहंता” अपभ्रंश में माँ “हनुमंता” हुआ।
दिव्य संकल्प, गुरु जी का आशीर्वाद, प्रथम भूमि पूजन


निर्माण
मंदिर का निर्माण प्राचीन वास्तु-शिल्प और आधुनिक मजबूती का अद्भुत मेल है। हर पत्थर पर मंत्रों की गूँज और भक्तों की अटूट श्रद्धा अंकित है। मायावी हनुदानव को खत्म करने वाली माँ हनुहन्ता, अपभ्रंश में माँ हनुमंता हो सकता है क्योंकि हनु दानव मायावी था अपने शरीर के करोड़ों रोमों को गाजर की तरह बड़ा लेता था, गाजर का अर्थ अस्त्र, भाला से आता है और माताजी के नाम से गांजर क्षेत्र है। प्रश्न बोधः — प्रेरणा शक्ति से चलो रामायण में चलते हैं। जब अहिरावण राम-लक्ष्मण को 70 हजार योजन नीचे पाताल पुरी ले गया था, उस समय हनुमंत लाल खोज करते गुरू, सूर्य विद्या का प्रयोग करके, पाताल पुरी पहुंच जाते हैं। हनुमंत लाल सोचने लगे, यह राक्षस नगरी बड़ी मायावी है। यदि हम यहाँ कोई भी सूक्ष्म रूप लेते हैं तो रामदूत के रूप में पहचाने जावेगें। हमें लंकगढ़ त्रिजटा जैसी पुर्नावृत्ति नहीं करना है। विचार मंथन किया और सोचा की देव, दानव रक्ष संस्कृति में जिस देवी, देवता की सामुहिक रूप से आस्था होती है, उसका परीक्षण नहीं होता। पाताल पुरी में अहिरावण राक्षसों सहित रक्षदेवी को प्रसन्न करने के लिए, महोत्सव मनाया और उसकी योजना राम-लक्ष्मण की बलि देने की थी। सभी राक्षस मदमस्त थे। नाच कूद रहे थे। उसी समय उस पाषाण मूर्ति को माँ शक्ति भेषधारी हनुमान स्वाद लेकर खाने लगे। सभी राक्षस प्रसन्न हुए की आज निकुम्ला देवी प्रत्यक्ष रूप से भोजन प्रसादी ले रही है। तब अहिरावण ने कहा, आज माता बहुत प्रसन्न है। चलो दोनों तपस्वियों की बलि देते हैं पर हमारा संविधान है कि मरने के पहले यदि किसी को रक्षा को बुलाना हो तो तुम्हे अल्प समय दिया जाता है। तब राम ने कहा माँ तो माँ होती है भले रक्षसंस्कृति की हो, बस अनुमति दें। हम तुम्हारी माँ की ममता को प्रणाम करना चाह रहे हैं। तब माँ शक्ति भेषधारी हनुमान ने सोचा कि यदि हमारे प्रभु प्रणाम करेंगे और हम आर्शीवाद का हाथ फैलायें हैं यह असंभव है, और यदि हथेली बंद करते हैं तो भेद खुल जावेगा। तभी हनुमंत लाल ने पराशक्ति का स्मरण किया कि हे माँ, सर्वशक्ति जहाँ भी हो तो हमारे शरीर में समावेशित हो जाओ, जिससे कुछ समय के लिए यह रहस्य ठहर जावेगा। माँ शक्ति समावेशित हुई और राम लक्ष्मण दोनों भाइयों ने प्रणाम किया। माँ शक्ति ने वरदहस्त किया तब राम ने कहा भाई लक्ष्मण माँ का वरदहस्त निष्फल नहीं होगा और प्रसन्न हुए। तभी हनुमंतलाल ने स्वयं स्वरूप में प्रकट होकर अहिरावण का वध किया और राम लक्ष्मण को लेकर पुनः वापस युद्ध स्थल में आये। अयोध्या पहुंचने पर बलि देने की बात माँ कौशिल्या को सुनाई तब माँ चौक गई और कहा बेटा फिर प्राण रक्षा किसने की और माँ हनुमान की तरफ देखने लगी तब राम ने कहा, हनुमान तो निमित्त थे वहाँ पर हनुमंत भेषधारी आदि शक्ति के आर्शीवाद से बचा, तो माँ कौशिल्या ने कहा जिस देवी शक्ति ने हमारे वंश की रक्षा की आज से रघुकुल में कुल देवी की तरह पूजीं जावेगी। हनुमान ने माँ का भेष लिया, और पराशक्ति का आव्हन किया। उसी समन्वय शक्ति का नाम माँ हनुमंता हुआ जो सभी ग्रामों में कुल देवी के रूप में पूजी जाती हैं। ऐसी प्रेरणा जागृत हुई।
वास्तु-शिल्प, कारीगरी, पावन शिलाएं
प्राण प्रतिष्ठा
विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा की गई। इस पावन क्षण ने धाम को साक्षात चैतन्य ऊर्जा से भर दिया। माँ हनुमंता देवी का स्थान प्राचीन है:- पॉच गॉव का मौजा रे, नहीं बस्ती दिखाय। बीच टगर पे बैंठी, हनुमंता मोरी माय।। प्राचीन समय में माँ हनुमन्ता देवी एक इमली वृक्ष के नीचे जड़ों में दबी हुई शिला पर बैठी थी। आसपास बहुत सारे बाने लगे हुए थे। माता जी, बड़ी माता, गांजर की खैरमाता नाम से जानी जाती थी। यह स्थान निर्जन था। वीरान ग्राम बेला, तोसकसी, पिपरिया, सेमरा, गांजर ग्राम टोला वीरान है। गांजर सेमरा ग्राम बासी कहा जाता है कि गांजर माता का इतिहास महोबा रियासत आल्हा ऊदल गांजर की लड़ाई से जुड़ा है। भानुप्रताप एक राजा थे, जो गढाकोटा के राजा मर्दन सिंह जू देव के निकटतम सम्बन्धी थे। जो पन्ना रियासत से संबंधित थे। गांजर की लड़ाई जो आल्हा खण्ड में मिलती है वहाँ के राजा के चचेरे भाई भानुप्रताप माताजी को साथ में लाये थे। “भानु प्रताप इक राजा रे, भारी तला तो खुदाय। खारो तला नाम राखों, गढ़कुअरपुर बसाय।। ” भानु प्रताप ने चार मानी यानी 16 एकड़ में तालाब खुदवाया था। जो माँ हनुमंता स्थान से पूर्व की तरफ एक किलोमीटर दूर है। वहाँ आज भी तालाब बाँध के पत्थर निकलते हैं और बांध के अवशेष प्राप्त हैं एवं पत्थर वहीं पड़े हुए हैं। इस तालाब का पानी खारा होने से खारोतला नाम पड़ा, महामारी एवं पानी की कमी के कारण गांजर, सेमरा ग्राम के वासी तालाब के निकट रहने लगे उस ग्राम का नाम वर्तमान में खारोतला ग्राम पड़ गया। गढ़कुअरपुर में भी बहुत प्राचीन मूर्तिं और गढ़ निर्माण के अवशेष मिलते हैं। गांजर खेर माता जो इमली वृक्ष के नीचे बैठी हैं। गाजर ग्रामवासियों द्वारा स्थापित ग्राम खारोतला अपनी माता को ले जाने लगे, सभी खारोतला वासियों ने पूजा-रचा प्रार्थना की और गाँव ले जाने लगे। माता जी के स्थान से मात्र डेढ़ किलोमीटर दूर ग्राम खारोतला है। बैलगाड़ी में बड़ी मेहनत से ग्रामवासियों ने गाजेबाजे के साथ माता की प्राचीन मूर्ति को बिठाया। बीच रास्ते में गाड़ी का पहिया, धुरा टूट गया तभी ग्रामवासियों ने पुनः माता जी को लेने गये, तो माता जी, टूटी गाड़ी में नहीं मिली और जब देखा तो इमली वृक्ष के नीचे बैठी मिली। सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ। यह बात समुचित क्षेत्र में फैल गई तभी से सभी भक्तजन दर्शनों को आने लगे एवं पूजा-पाठ जवारे और भक्तें करने लगे। सभी की इच्छित मनोकामना पूर्ण होने लगी। माता का नाम माँ हनुमंता “बड़ी माता” के नाम से प्रसिद्धि पाई। ग्राम खारोतला के साथ समुचित क्षेत्र ग्राम के भक्तजन भंडारा, जवारे लेकर चैत्र की नवदुर्गा में आने लगे और बैशाख मास बाटियाँ, बैगन भर्ता, दाल बाटी का भंडारा करने लगे। यह माता जी का बहुत प्राचीन स्थान है। माताजी इमली वृक्ष के नीचे बैठी, तिन्डती, वृक्ष छायायां, शिला सिंहासन स्थितः।। ग्राम की सियानी बड़ी बऊ ने कुछ ईटों का चबूतरा बनवाया पूजा रचा प्रार्थना की – हे माँ, अब चबूतरा पर बैठ जाओ, क्योंकि इमली वृक्ष की जड़ों ने जहाँ माता बैठी थी उस शिला को ढक लिया, वह शिला आज भी विद्यमान है अब माता जी को ढक लेगी, इसलिए विशेष विनय प्रार्थना की। सियानी बऊ खारोतला, मढ़िया लिम्बरदार से संबंधित थी। आज भी मढ़िया लिम्बरदार के यहाँ से चैत्र दशमी को पान परसादी बहुत से ग्रामों की भक्तें बुलवाते थे और स्थान पर चलो शब्द कहना वर्जित था। चलो शब्द कहने से माँ को रूष्ठता थी। अब ग्राम खारोतला चलने की कोई हठ नहीं करता है। अब माँ प्रसन्न हैं अब चलो शब्द कहना वर्जित नहीं समय का परिवर्तन हुआ। “न जाने कौन से गुण पर दयानिधि रीझ जाते हैं,”
वैदिक अनुष्ठान, प्राण प्रतिष्ठा, दिव्य ऊर्जा


महायज्ञ
धाम में समय-समय पर महायज्ञों का आयोजन होता है, जो विश्व कल्याण और शांति के लिए समर्पित हैं। इन यज्ञों से वातावरण शुद्ध और भक्तिमय हो जाता है। सन् 1990 — मंदिर पूजा व्यवस्था सन् 1990 में सतना से पुजारी पं. नरेश त्रिपाठी जी को रखा गया जो मंदिर की पूजा अर्चना की व्यवस्था करते रहे। सन् 1992 — माँ हनुमंता की मूर्ति और प्राण प्रतिष्ठा सन् 1992 में माँ हनुमंता देवी की मूर्ति लेने के लिए हम और सुभाष पन्डा जयपुर गये एवं वहाँ से मूर्ति लाये।
यज्ञ अनुष्ठान, आहुति, शांति पाठ
विकास
आज माँ हनुमंता धाम श्रद्धालुओं के लिए एक प्रमुख केंद्र बन चुका है। निरंतर विकास और सेवा कार्यों के माध्यम से यह धाम मानवता की सेवा में तत्पर है। माँ हनुमंता धाम गांजर क्षेत्र के समुचित विकास जनक पं. गोपाल भार्गव पूर्व केबिनेट मंत्री एवं विकास समिति अध्यक्ष पं. अभिषेक भार्गव द्वारा शादी हॉल, 25 दुकाने, सी.सी. रोड, सामुदायिक भवन, कृषक भवन, प्रांगण में सी.सी., जीर्णोद्धार तालाब, बगीचा, वृक्षारोपण, चिरस्मरणीय विकास हुआ। माँ हनुमंता देवी का पूर्ण वरदहस्त प्राप्त जन-जन के चहेते रहली विधानसभा क्षेत्र, भैया जी की हृदय स्थली है। ऐसे विकास जन हृदय सम्राट को शत शत नमन। जय माँ हनुमंता 🙏
निरंतर सेवा, विकास कार्य, जन कल्याण

भक्ति ही धाम का आधार है।
माँ हनुमंता धाम

गुरु जी का
दिव्य आशीर्वाद
माँ हनुमंता धाम की स्थापना गुरु जी के संकल्प और अटूट भक्ति का परिणाम है। यहाँ हर ईंट में उनकी तपस्या और श्रद्धालुओं के प्रति करुणा का वास है। गुरु जी का जीवन परिचय केवल एक गाथा नहीं, बल्कि धर्म और सेवा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा है। मंदिर का निर्माण, प्राण प्रतिष्ठा और यहाँ होने वाले यज्ञ उनकी आध्यात्मिक शक्ति के प्रतीक हैं। हम आपको आमंत्रित करते हैं कि आप इस पावन धाम में आएं, गुरु जी के दर्शन करें और अपने जीवन को भक्ति के प्रकाश से भरें।
“भक्ति ही जीवन का आधार है।”
दिव्य/
अनुभूतियाँ






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